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हौसला कुछ कर दिखाने का !- Motivational Story in Hindi

Motivational Story in Hindi
Written by Pooja

 

हौसला कुछ कर दिखाने का !- Motivational Story in Hindi

 

तालियों की गड़गड़ाहट से हाल गूंजने लगा जब आगे बढ़ कर अनुभूति ने महामहिम राष्ट्रपति जी से पुरस्कार प्राप्त किया। सबकी नजर सिर्फ अनुभूति पर टिक गई। आखिर काम ही ऐसा किया है उसने कि सब हैरान है। एक अपाहिज लड़की और गजब का साहस। आज हर अखबार हर खबर में अनुभूति का ही जिक्र है। उसके मम्मी पापा गर्व से फूले नहीं समा रहे। घर पहुंचते ही बधाइयों का तांता लग गया। यह वही लोग हैं जो कभी अनुभूति से कहते थे कि इन नक़ली पैरों से ज्यादा दूर नहीं जा पाओगे।

 

आज उसने सबको बता दिया। आज उसका मन शांत है। और होठों पर निश्चल मुस्कान। वो इस पल को जी लेना चाहती है। धीरे-धीरे सब अपने घर जाने लगे। अब वो अपने मम्मी पापा के साथ थी। मां की गोद में सिर रखकर वह सपनों में खो जाना चाहती थी। उसने कहा मां मुझे अपनी गोद में लिटा लो। मां भी उसे एक मासूम बच्चे की भांति लाड प्यार करने लगी। अचानक अनुभूति की आंख से आंसू की एक बूंद टपक कर मां के आंचल पर गिरी। मां ने जैसे ही उसका चेहरा देखा तभी अनुभूति की आंखों से  आँसू बह चले। अनुभूति को पिछली सारी बातें याद आ रही थी। कितने अच्छे दिन थे और फिर वह हादसा जिसमें उसकी जिंदगी ही बदल गयी ।

 

अपने कॉलेज में सबसे होनहार थी अनुभूति। बात पढ़ाई की हो संगीत की या अन्य किसी गतिविधि की अनुभूति सब में अव्वल ही रहती। अबकी उसका फाइनल ईयर था कि अचानक सब बदल गया। हुआ यूं कि वह अपने कालेज से घर की ओर वापस आ रही थी कि अचानक उसकी नजर एक बच्चे पर पड़ी जो बस के नीचे आने वाला था। अपनी जान की परवाह किए बगैर जल्दी से भागी और उसने बच्चे को ढकेल कर बचा लिया पर वो बस के नीचे आ गई। उस एक्सीडेंट में उसने अपनी दोनों टांगे गवा दी।

 

इस एक्सीडेंट के बाद उसका जीवन ही बदल गया।सब उससे सहानुभूति दिखाते फिर धीरे धीरे से बचने लगे। उसे अब अपने लिए सब खुद ही करना था। उसका इलाज चला। घाव तो भरने लगे पर मन में बोझ बढ़ता गया। उसके मम्मी पापा चाहते कि वह पढ़ाई पूरी करें। डॉक्टर से संपर्क कर उन्होंने जानना चाहा कि वह बताएं कि आगे अनुभूति कैसे चल पाएगी।

 

डॉक्टर ने कहा आजकल यह बिल्कुल भी कठिन नहीं। कृतिम टांगो की सहायता से वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है। पर इसमें समय लगता है। आप लोगों को अनुभूति के आत्मबल को मनोबल को कम होने नहीं देना है। उसके मां पिता थोड़े शांत हुए। उन्होंने उसी डॉक्टर से अनुभूति के लिए कृतिम अंग लगवाने का फैसला लिया।

 

डॉक्टर ने सारी जांच करा अनुभूति को कृतिम टांगे लगा दी। पर हिदायत दी कि धीरे-धीरे चलने की कोशिश करनी है। अनुभूति इन नकली पैरों को पाकर खुश थी जैसे ही वह चली गिर पड़ी। डॉक्टर ने समझाया धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा और वह सब की तरह से चल पाएगी। घर आकर वह चल चल कर देखती।

 

गिर पड़ती फिर उठती। अब रोज वह प्रयास करती गिरती फिर उठती फिर चलती। उनके यहां जो भी रिश्तेदार आते सहानुभूति दिखते और सांत्वना देते। कुछ रिश्तेदार अनर्गल बातें करते उसको लाचार बताते। इस  घड़ी में उसके मम्मी पापा और उसकी सहेली दीप्ति ने उसका साथ दिया।
अनुभूति के मम्मी पापा और दीप्ति उसका हौसला बढ़ाते। वह गिरती तो उसे उठने के लिए प्रोत्साहित करते। वह हार मानती तो उसे संभालते। आखिर उन सब के प्रयासों से अनुभूति कुछ ही महीनों में चलने लगी। उसने अपनी पढ़ाई पूरी करने का निर्णय लिया। यही नहीं वह अच्छे अंको से उत्तीर्ण भी हुई। आगे की पढ़ाई के लिए उसने देहरादून जाने का मन बनाया। उसके माता-पिता को भी इसमें कोई परेशानी नहीं नजर आई। उन्होंने हां कर दी।

 

देहरादून के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय से उसने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने का मन बनाया और प्रवेश परीक्षा उसने आसानी से पास कर ली। उसे दाखिला मिल गया। अब मेहनत करो पढ़ाई करने लगी। कभी उसे तकलीफ होती जब वह तेज चलती। पर उसने हार नहीं मानी। उसे तो बस हालातों को हराना था। ऐसे ही उसका पहला साल गुजर गया। परीक्षाएं हुई और अवकाश हो गए।

 

उसके कॉलेज से छात्र-छात्राओं ने मसूरी जाने का प्लान बनाया। वह भी जाना चाहती थी और उसने भी अपना नाम लिखा दिया। मसूरी में सभी छात्र छात्राओं ने केंपटी फॉल, माल रोड घूमने का निश्चय किया। कुछ छात्र छात्राओं का समूह पर्वतारोहण पर जाना चाहता था। अनुभूति का भी बहुत मन हुआ कि वह पर्वतारोहण पड़ जाए।

 

पर कोई इस बात के लिए तैयार नहीं हुआ कि उसे ले जाए। सब का यही कहना था कि यह असंभव है। कृतिम टांगों से वह पर्वतारोहण नहीं कर सकती। सब अपने-अपने समूह में शामिल हो घूमने निकल गए। अनुभूति का मन बहुत खराब हुआ और वह कहीं नहीं गई। दो-चार दिन घूम कर सब वापस कॉलेज आ गए। अनुभूति को रास्ते में समझाते रहे कि वह इसके अलावा कोई भी काम करें उसमें मन लगाए। अनुभूति का मन तो पर्वतों में खोया था। उसने पर्वतारोहण संस्थान के बारे में खोजा। सारी जांच की। रिपोर्ट्स को पड़ा। एक अच्छे संस्थान का पता चला। उसने उनको मेल किया कि वह किस हालत में है और पर्वतारोही बनना चाहती है। उस स्थान से उसको जवाब ईमेल आया कि सामान्य व्यक्तियों के लिए ही पर्वतारोहण कठिन होता है और कृतिम टांगों से तो करना असंभव सा ही है। वह बिल्कुल निराश नहीं हुई उसने फिर से मेल किया, मैं असंभव को संभव कर दिखाना चाहती हूं। उसके इस मेल के बाद संस्थान ने उसे मिलने के लिए बुलाया।

 

वह इसी पल का इंतजार कर रही थी। अनुभूति के जज्बे को देख संस्थान ने उसका साथ देने का फैसला किया। उस का प्रशिक्षण शुरू हो गया। उसने मन में ठान लिया था कि उसे पर्वत चोटी फतह करनी है। समय से प्रशिक्षण कक्षाएं लेती। धीरे-धीरे उनका प्रशिक्षण खत्म हो रहा था और उसके हौसले बुलंद हो रहे थे। सबसे पहले एक छोटी पर्वत चोटी पर उसे एक समूह के साथ भेजा गया।

 

उसका प्रयास अविश्वसनीय था। पहले ही प्रयास में उसने बिना किसी बाधा के उस छोटी को पार कर लिया था।अब तो उसके कदम रुकने को तैयार ही नहीं थे। सब उसके हौसले को देखकर हैरान थे। उसने अब अपने मन की इच्छा जताई कि उसे माउंट एवरेस्ट फतह करना है। सब उसकी बात सुनकर आश्चर्यचकित थे। संस्थान के निदेशक ने खुद बछेंद्री पाल से उसे मिलवाया । बछेंद्री पाल अनुभूति से मिल उसके हौसले को देख उसे खुद प्रशिक्षण देने के लिए तैयार हुई। उनका भी दिल जीत लिया। ना वह हार मानती नहीं थक कर बैठती।

 

वह तो जैसे कुछ बड़ा करना चाहती थी। हर बारीकी को उसने करीब से देखा। वो जल्दी उसने अपना परीक्षण पूर्ण कर लिया.. आ गया वो समय जब उसे अपने समूह के साथ अनुभूति को माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई शुरू करनी थी। माँ पिता और अपनी गुरु बचेंद्री पाल जी का आशीर्वाद ले वह निकल पड़ी अपनी उड़ान पर। लगभग 112 दिनों में उसने अपनी चढ़ाई पूर्ण की। माउंट एवरेस्ट को फतह किया। तथा अति विशिष्ट विकलांग व्यक्तियों की श्रेणी में पहली सफलता हासिल की। माउंट एवरेस्ट फ़तेह करने वाली पहली विकलांग महिला बनी। उसके हौसलों की उड़ान को देख सब नतमस्तक थे। मां ने जैसे ही अनुभूति के सर पर हाथ रखा तो वह वर्तमान में लौट आई। अब आंखों से  उसने अपने आंसुओं को संग सदा के लिए बहा दिया।
वो बस बच्चा बन अब कुछ पल मां की गोद में निश्चल सो गई। मां उसे बच्चों की भांति सोया देख आत्म विभोर हो रही थी क्योंकि वह जानती थी कि उनकी बेटी ने आज क्या हासिल किया है। उनका भी चित्त आज शांत था और अनुभूति उनकी गोद में थी।
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Pooja

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